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असल में मनुष्य ने जंगली जीव जंतुओं के अधिकारों का हनन करते हुए अपने रिहायशी एवं कामकाज के स्थान को बढ़ाते हुए जंगल में अतिक्रमण कर लिया है और लगभग पिछले २० साल में ३० फ़ीसदी से अधिक जंगल समाप्त हो गए है।

जिससे जंगली जानवर मनुष्य के करीब आने के लिए मजबूर हो चुके हैं जिस प्रकार से केरल में एक हथिनी को बारूद का फल देकर मारा गया वैसे ही एक हिमाचल के बिलासपुर में एक गाय के मुख में भी बारुद फटा वह भी गर्भवती थी जिसके कारण वह बुरी तरह से जख्मी हो गई और देहरादून में एक सांड के ऊपर किसी व्यक्ति के तेजाब डालने से वह सांड भी 2 महीने तक तड़पता रहा।

इस प्रकार से किसी भी जानवर को मारना अशोभनीय एवं अमानवीय है।
यदि आज हम इस हथिनी की मौत पर राजनीति ना करके इससे सीख ले और आगे के लिए अधिक कठोर नियम बनाए जा सकते हैं जिससे भविष्य में ऐसी घटनाएं ना हो सके।

साथ ही ऐसा सुनने में आ रहा है दक्षिण भारत में लगभग 2500 हाथियों से भीख मंगवाने का काम करवाया जा रहा है।
हम वाइल्डलाइफ एसओएस एवं मेनका गांधी जी से अनुरोध करते हैं कि इन हाथियों को भरसक प्रयत्न करके मुक्त करा लेना चाहिए और

जब करोना काल में करोड़ों लोगों के खाने की व्यवस्था की जा सकती हैं, तो क्या इन बेजुबान भोले जानवरों के लिए नहीं की जा सकती ??
इसका सीधा उत्तरदायित्व मनुष्य पर ही हैं , क्योंकि मनुष्य ने ही इनके घरों में अतिक्रमण किया है।

भारत की संपूर्ण जनता से यह आवाहन किया जाना चाहिए कि वह इन हाथियों के एवं अन्य पशु पक्षियों के रखरखाव के लिए यथोचित दान दे। इसके लिए एक पीएम फंड के तरह एक अलग कोष भी बनाया जा सकता है जिसके तहत सभी लोग अनेक माध्यमों से इसमें दान दे सकते है।

यह हम सभी का उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य हैं, जरा विचार करें

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